रविवार, 22 मार्च 2009

कविता ----- जिन्दगी


कहते हैं जिसे जिन्दगी
उसे ढूँढती हूँ गली गली
क्या नाम है क्या उसका पता
पूछती हूँ गली गली।

आंख जबसे है खुली
मटमैली चादर सी धुली
दिन गुजरता फांकों में
रात कटे बदनाम गली।

मिल जाए गर मुझे जिन्दगी
पूछूंगी उससे कई सवाल
क्यों इंसानी रिश्तों में वह
दो पाटों के बीच ढली।

क्या अमीरों की शान जिन्दगी
या गरीबी की दास्तान जिन्दगी
क्यूं किसी को लगती अनमोल जिन्दगी
क्यों किसी को मौत जिन्दगी से लगती भली।

तू मुझे मिले या ना मिले
चलो कोई शिकवा नहीं
थक चुकी तुझे ढूंढ ढूंढ
अब तो शाम हो चली।

पर मेरा संदेश तेरे नाम है जिन्दगी
एक समय ऐसा आए
जब दिल के हर दरवाजे से निकले
प्रेम से भरी प्रेम गली।
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पूनम

बुधवार, 18 मार्च 2009

ग़ज़ल--बता दो जरा


अंधेरे में दिया जला दो जरा
मुझे कोई रास्ता सूझता नहीं।

जिंदगी बन गयी पहेली मेरी
मगर कोई उसको बूझता नहीं।

उठते हुए को पूजते हैं लोग
गिरते को कोई पूछता नहीं।

मन में पडी जो ऐसी दरार
लाख कोशिश से भी वो जुड़ता नहीं।

मोम सा दिल ऐसा पत्थर बना
जो पिघलाने से भी अब पिघलता नहीं।

दिल पर जख्म इतने गहरे हुए
जो मलहम लगाने से सूखता नहीं।

बता दो जहाँ में इन्सां कोई ऐसा
जो मुश्किलों से कभी जूझता नहीं।
०००००००००
पूनम

शनिवार, 14 मार्च 2009

यादें




यादों के झरोखों से झांक लिया करूंगी
अतीत के पन्ने कभी पलट लिया करूंगी।

पल पल को समेटती चलती हूँ कभी
बीते हुए वक्त को दुहरा लिया करूंगी।

याद आयेगी तेरी जिंदगी के किसी मोड़ पे
दिल के आईने से तुझे देख लिया करूंगी।

सच का आईना होता है कड़ुआ बहुत मगर
अपने आप को फ़िर भी भरमा लिया करूंगी।

छोटी सी जिंदगी में रास्ते हैं कठिन बहुत
पर मंजिल पाने की कोशिश तो करुंगी।
०००००००००००००००
पूनम

बुधवार, 11 मार्च 2009

आया देखो फागुन री


आया देखो फागुन री
मन सबका भटकाए री
लहर लहर बरसे रंग अंगना
सारी देह भिजो डारी।


रंग दे सखि इक ऐसे रंग में
जीवन भर ना छूटे री
रंग होरी के कच्चे सारे
पर पी का संग ना छूटे री ।

आज पिया बन कृष्ण कन्हैया
रंग देंगे जो तन मन सारा
मैं राधा बन रास रचाॐ
कंत के संग रंग जाऊं री।


बाकी रंग तो कच्चे सारे
मन का रंग ही पक्का री
इस रंग में रंग दे जो हमको
सखि ऐसा गीत सुना जा री।
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सभी पाठकों को होली की शुभकामनाएँ
पूनम




रविवार, 8 मार्च 2009

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सभी पाठकों,चिट्ठाकारों को हार्दिक मंगल कामनाएं।
आज की मेरी कविता सभी महिलाओं को समर्पित है।
नारी
अबला नहीं आज तो
सशक्त है नारी
स्वाभिमान स्वावलंबन से
भरपूर है नारी।

चहारदीवारी के भीतर
और बाहर भी
अपने अस्तित्व के साथ
संपूर्ण है नारी।

कहीं पत्थर की मूरत तो
कहीं अहसास कोमल भी
कहीं शोला कहीं शबनम
कहीं परवाज है नारी।

जो छेड़े दिल के तार
ऐसी साज है नारी
हर रूप में अपने
नया अंदाज है नारी।

कई महान विभूतियों में
से एक है नारी
बूझ न पाए देव मुनि
ऐसी राज है नारी।

फ़िर भी क्यूं नहीं हम
मानने को हैं तैयार
आज तो समाज का एक
स्तम्भ है नारी।
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पूनम

गुरुवार, 5 मार्च 2009

एक फूल


मैं एक फूल हूँ
जिसकी महक का एहसास
करते हो तुम
इन वादियों में
और जिसकी खुशबू से
सुगन्धित करते हो
तुम अपने मन को।

लेकिन क्या तुम
बन सकते हो फूल
क्योंकि तुम्हें भी मेरी तरह
अपने आंसुओं को
पीना पड़ेगा
और देना पड़ेगा अमृत
जो मैंने तुमको दिया है।
००००००००००
पूनम

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

उड़ान


अनजाना सपनों में कोई
अच्छा लगता है
अपनों में वो बेगाना भी
अच्छा लगता है।

अनदेखा है फ़िर भी वो
जाना पहचाना लगता है
अनजानी सी डगर पे चलना
फ़िर अच्छा लगता है।

लुका छिपी का खेल निराला
वो तितली की पकड़ा पकडी
गुड्डे गुडियों का ब्याह रचाना
अब बचकाना लगता है।

सखियों के संग समय बिताना
अच्छा लगता है
पर अकेले में मुस्काना भी
अब अच्छा लगता है।

दिल को तन्हाई का आलम
अच्छा लगता है
तस्वीरों से भी बतियाना
अच्छा लगता है।

दिल की बात बताऊँ जिससे
साथी ऐसा नहीं मिला
मिल जाता जो साथी मन का
अच्छा लगता है।
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पूनम